Namaz Ke Faraiz Kitne Hain । नमाज़ के फराइज और इसका बयान जानिए

आज यहां आप Namaz Ke Faraiz Kitne Hain इसका जवाब जानेंगे हमने यहां पर नमाज़ के फराइज के साथ साथ इसका बयान भी हिंदी के बहुत ही आसान और साफ़ लफ्ज़ों में डिटेल्स में एक्सप्लैन किया है।

इसे पढ़ने के बाद आप बहुत ही आसानी से नमाज़ के सभी फर्ज डिटेल्स में समझ जाएंगे जिसे आप आसानी से फर्ज सहित नमाज़ मुकम्मल कर सकेंगे तो पूरा लेख ध्यान से आख़िर तक पढ़ें और समझें।

Namaz Ke Faraiz Kitne Hain

नमाज़ के 7 फराइज निम्नलिखित है:-

  1. तकबीरे तहरीमा
  2. कयाम करना
  3. किराअत करना
  4. रुकुअ करना
  5. सज्दा करना
  6. काअदए अखिरा
  7. नमाज़ पुरा करना

नमाज़ के 7 फराइज हैं पहला फर्ज तकबीरे तहरीमा, दुसरा फर्ज कयाम, तिसरा किराअत, चौथा रूकुअ, पांचवा सज्दा, छठां काअदए आखिरा, आखरी और सांतवा फर्ज सलाम फेर कर नमाज़ पुरा करना है।

Namaz Ke Faraiz Kitne Hain

1. पहला फर्ज तकबीरे तहरीमा

यहां तकबीरे तहरीमा मतलब यह है कि अल्लाहु अकबर कहकर नमाज शुरू करना चाहिए हालांकि नमाज में कई बार अल्लाहु अकबर कहा जाता है।

लेकीन यहां नमाज़ शुरू करते वक्त जो अल्लाहु अकबर कह कर नियत बांधा जाता है उसकी जिक्र की गई है वही तकबीरे तहरीमा फर्ज है।

यह हुआ नमाज़ का पहला फर्ज जिसे छोड़ने से नमाज नहीं होती बाकी और बार भी अल्लाहु अकबर कहा जाता है उसे तकबीरे इन्तिकाल कहते हैं।

नमाज के तमाम शर्त यानी तहारत,‌ सतरे औरत, इस्तिकबाले किब्ला वक्त और नियत का होना तकबीरे तहरीमा कहने से पहले पाया जाना ज़रूरी है।

अगर अल्लाहु अकबर कह चुका और कोई शर्त बाकी रहा हो तो नमाज कायम नहीं होगी इसका ध्यान रख कर ही नमाज़ शुरू करें।

अगर कोई बोलने के काबिल न हो यानी गुंगा हो या किसी वजह से‌ जुबान बंद हो तो ऐसे शख्स को मुंह से बोलना वाजिब नहीं दिल का इरादा ही काफी है।

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2. दुसरा फर्ज कयाम करना

कयाम यानी नमाज़ में खड़ा होना इस तरह से खड़ा हो कि हाथ लम्बा करें तो घुटने तक हाथ न पहुंचे और सिधा खड़ा हो जाएं किराअत पुरा होने तक खड़ा रहें।

कयाम के दौरान दोनों पांवों के दरमियान चार उंगलियों का दूरी यानी फासला रखना सुन्नत है कयाम का मतलब खड़ा होना लेकिन सभी के लिए नहीं।

यहां पर भी वही बात जो शख्श खड़े होने का काबिल न हो उस पर फर्ज नहीं आलस के वजह से कयाम छोड़ना हरगिज जायज नहीं है।

लेकीन जो शख्श खड़े होने के काबिल हो वह अच्छे से खड़े होंगे इधर का टेढ़ा या उधर का झुका नहीं दुरूस्त और सिधा खड़ा रहना चाहिए।

3. तीसरा फर्ज किराअत करना

किराअत मतलब यह है कि कुरआन पाक इस तरह पढ़ना कि तमाम हुरूफ यानी हर अक्षर अपने मखरज से सहीह तौर पर अदा किया जाए।

यहां तक कि हर हर्फ अपने में एक दुसरे से सही तौर पर अलग हो जाएं आहिस्ता पढ़ने में जरूरी है कि इतनी आवाज से पढ़ें कि खुद को सुनने में आए।

अगर कोई अगल बगल में शोरगुल ना हो या फिर खुद में सुनने की क्षमता सही हो तो ऐसे में आवाज आपको सही से आनी चाहिए।

अगर किराअत खुद को भी ना सुनाई दे तो यहां पर नमाज़ नहीं होगी किराअत में सूरह फातिहा पुरी पढ़ना सातों आयतें सही और पुरा पढ़ना वाजिब है।

सूरह फातिहा का एक लफ्ज क्या एक हर्फ भी छोड़ना नहीं है अगर छुट जाए तो सज्दए सहव करना चाहिए छोटी छोटी बातों का ध्यान रखें।

इमाम के पीछे नमाज पढ़ने पर किराअत नहीं करना है हज़रत उमर फारूके आज़म रदिय्यल्लाहो तआला अन्हु फरमाते हैं कि जो इमाम के पीछे किराअत करता है।

काश! उसके मुंह में पत्थर हो।

4. चौथा फर्ज रूकुअ करना

रूकुअ में इतना झुकना कि हाथ बढ़ाए तो हाथ घुठने तक पहुंच जाए यह रूकुअ का अदना दर्जा है फिर रूकुअ का कामिल दर्जा यह है।

की पीठ सीधी बिछा दें, रूकुअ मेराज के बाद अता हुआ मेराज की सुबह में जो भी नमाजे जोहर तक पढ़ी गई तब तक रूकुअ न था।

इसके बाद असर कि नमाज़ में इसका हुक्म आया रूकुअ में कम से कम तीन मरतबा सुब्हान रब्बियल अज़िम कहना सुन्नत है।

ध्यान दें कि तीन मरतबा से कम कहने में सुन्नत अदा नहीं होगी जबकि पांच मरतबा कहना मुस्तहब है हर नमाज़ की रकात में सिर्फ एक ही रूकुअ करें।

5. पांचवा फर्ज सज्दा करना

हर रकात के बाद दो बार सज्दा करना चाहिए पेशानी का ज़मींन पर लगना सज्दा कि हकिकत है साथ ही सजदे में इन अंगों को लगना जरूरी है।

यानी कि पेशानी के साथ नाक, दोनों हाथों कि हथेलियां, दोनों घुठने और दोनों पांव कि उंगलियां कुल आठ जिस्म कि अंग लगना जरूरी है।

आपको भी शायद मालूम होगा कि इमाम मुस्लिम ने हजरत अबू हुरैरा रदिय्यल्लाहो तआला अन्हु रिवायत कि, की हुजुरे अकदस सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं।

कि बंदे को खुदा से सबसे ज्यादा नजदीकी सजदा मे ही हासिल होता है खुदाए तआला के सिवा किसी को भी सजदा करना जाइज नहीं।

गैरे खुदा को इबादत का सजदा करना सिर्क है और ताजिम का सजदा करना हराम है, यानी कि सजदा करते वक्त सिर्फ यह नियत मन में रखे कि।

हम अपने रब यानी कि अल्लाह तबारक व तआला कि सजदा कर रहे हैं सजदे में पांव की एक उंगली का पेट जमीन से लगना फर्ज है।

किसी ने इस तरह सज्दा किया की दोनों पांव जमीन से उठा रहे तो नमाज ना होगी बल्कि अगर सिर्फ उंगलियां की नोक जमीन से लगी तो भी नमाज ना होगी।

सज्दा में कम से कम तीन मरतबा सुब्हान रब्बियल अला पढ़ना सुन्नत है तीन मरतबा से कम पढ़ने में सुन्नत अदा न होगी जबकि पांच मरतबा कहना मुस्तहब है।

सुब्हान रब्बियल अला कहते वक्त इतनी देर में एक के बाद एक पढ़ें कि बीच में सुब्हान अल्लाह कहा जा सके लेकिन कहना नहीं है।

6. छठा फर्ज काअदए अखिरा

काअदए अखिरा मतलब यहां पर यह है कि नमाज़ का आखिरी करना जिसके बाद सलाम फेर कर नमाज़ मुकम्मल यानी पुरी कि जाती है।

यानी कि नमाज की रकअतें पुरा करके कादाए अखिरा में इतनी देर बैठना कि पुरी अत्तहियात पढ़ ली जाए यही फर्ज है काअदए अखिरा में पुरा तशह्हुद पढ़ना वाजिब है।

तशह्हुद पढ़ते वक्त उसके माना का इरादा जरूरी है यानी कि तशह्हुद पढ़ते वक्त यह इरादा करे कि मैं अल्लाह तआला का हम्द यानी कि तारीफ करता हूं।

काअदए अखिरा में तशह्हुद पढ़ना भुल जाए तो सज्दए सहव करना वाजिब है फिर दुरूदे इब्राहिम और दुआ ए मासुरह पढ़ना सुन्नत है और यहां पर दुरूदे इब्राहिम ही पढ़ें इसमें सय्यिदिना कहना अफज़ल है।

7. सांतवा फर्ज नमाज़ पुरा करना

अपने इरादे से नमाज से बाहर आना यानी नमाज मुकम्मल करना करना काअदए अखिरा के बाद सलाम करना जो नमाज़ से बाहर कर दे।

अगर सलाम के अलावा कोई इरादा हो तो नमाज वाजिब होगी नमाज़ को दोबारा पढ़ना वाजिब होगा नमाज़ पुरी करने के लिए अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाह कहना सुन्नत है।

अलैकुमुस्सलाम कहना मकरूह है और आखिरी में व बरकातुहू भी नहीं मिलाना चाहिए सलाम फेरते वक्त मन में इरादा रखें कि हम फरिश्तों को सलाम कर रहे हैं।

अंतिम लफ्ज़

मेरे प्यारे मोमिनों आप ने अब तक तो नमाज़ के फराइज समझ ही गए होंगे अगर आपके मन में कोई सवाल हो तो आप हमसे कॉमेंट करके पूछ सकते हैं और इस बात को ज्यादा से ज्यादा लोगों के बीच शेयर करें जिसे वो भी नमाज़ के सभी फराइज जान सकें।

एक बात और अगर कहीं पर आपको गलत लगा हो या कहीं कुछ छूट गई हो तो भी आप हमें कॉमेंट करके इनफॉर्म करें ताकि हम अपनी गलतियां सुधार सकें हम सब से छोटी बड़ी गलतियां होती रहती है इस के लिए आप को हम सब का रब जरूर अज्र देगा इंशाल्लाह तआला।

My name is Muhammad Ittequaf and I'm the Editor and Writer of Namazein. I'm a Sunni Muslim From Ranchi, India. I've experience teaching and writing about Islam Since 2019. I'm writing and publishing Islamic content to please Allah SWT and seek His blessings.

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